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अनिवार्य लाइसेंसिंग: बौद्धिक संपदा अधिकारों में एक महत्वपूर्ण संतुलन

पेटेंट एकाधिकार और जनहित के बीच सामंजस्य स्थापित करने का एक प्रभावशाली तंत्र

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मुख्य बिंदु

  • अनिवार्य लाइसेंसिंग एक कानूनी प्रावधान है जिसमें सरकार किसी तीसरे पक्ष को पेटेंट मालिक की सहमति के बिना पेटेंट प्रौद्योगिकी के उपयोग की अनुमति देती है।
  • भारत में पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 84, 92, और 100 अनिवार्य लाइसेंसिंग के लिए कानूनी आधार प्रदान करते हैं।
  • अनिवार्य लाइसेंसिंग का मुख्य उद्देश्य आवश्यक उत्पादों तक सामाजिक पहुंच सुनिश्चित करना और पेटेंट के दुरुपयोग को रोकना है।

अनिवार्य लाइसेंसिंग क्या है?

अनिवार्य लाइसेंसिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सरकार किसी तीसरे पक्ष को पेटेंट मालिक की सहमति के बिना पेटेंट किए गए उत्पाद या प्रक्रिया का उपयोग, निर्माण, विक्रय या आयात करने की अनुमति देती है। यह विशेष रूप से तब लागू होता है जब पेटेंट धारक पेटेंट के अधिकारों का दुरुपयोग कर रहा हो या जब जनहित में आवश्यक उत्पाद उचित मूल्य पर उपलब्ध न हो।

यह बौद्धिक संपदा कानून के तहत एक अपवाद है, जहां सामान्यतः बौद्धिक संपदा के स्वामी को विशेष अधिकार मिलते हैं। अनिवार्य लाइसेंस के अंतर्गत, लाइसेंसधारी को पेटेंट धारक को एक निर्धारित शुल्क या रॉयल्टी का भुगतान करना होता है।


भारत में अनिवार्य लाइसेंसिंग के कानूनी प्रावधान

भारत में अनिवार्य लाइसेंसिंग का कानूनी ढांचा भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 के अध्याय XVI में निहित है। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:

धारा 84: अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन

इस धारा के अनुसार, कोई भी इच्छुक व्यक्ति पेटेंट की मंजूरी के तीन वर्ष बाद किसी भी समय पेटेंट नियंत्रक को अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकता है, यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं:

  • जनता की उचित आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई हैं
  • पेटेंट आविष्कार जनता को उचित और सस्ती कीमत पर उपलब्ध नहीं है
  • पेटेंट आविष्कार का भारत के क्षेत्र में व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा रहा है

धारा 92: राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनिवार्य लाइसेंस

यह धारा केंद्र सरकार को "राष्ट्रीय आपात स्थिति" या "अत्यधिक तात्कालिकता की परिस्थितियों" या "सार्वजनिक गैर-वाणिज्यिक उपयोग" के मामलों में अनिवार्य लाइसेंस जारी करने का अधिकार देती है। इस स्थिति में, पेटेंट धारक के साथ स्वैच्छिक लाइसेंस के लिए बातचीत करने की आवश्यकता नहीं होती है।

धारा 92A: निर्यात प्रयोजनों के लिए अनिवार्य लाइसेंस

यह धारा फार्मास्युटिकल उत्पादों के निर्यात के लिए अनिवार्य लाइसेंस की अनुमति देती है, विशेष रूप से उन देशों को जहां या तो निर्माण क्षमता अपर्याप्त है या फिर बिल्कुल नहीं है, जिससे संबंधित देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक फार्मास्युटिकल उत्पादों का आयात करने की आवश्यकता होती है।

धारा 100: सरकार द्वारा उपयोग

यह धारा सरकार को पेटेंट किए गए आविष्कारों का उपयोग सरकारी प्रयोजनों के लिए करने का अधिकार देती है। सरकार सरकारी उपक्रमों को भी इन पेटेंट का उपयोग करने का अधिकार दे सकती है।

अनिवार्य लाइसेंसिंग के लिए आवश्यक शर्तें

धारा शर्तें समय सीमा आवेदन कौन कर सकता है
धारा 84 - जनता की उचित आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई हैं
- उत्पाद उचित मूल्य पर उपलब्ध नहीं है
- भारत में पेटेंट का उपयोग नहीं किया जा रहा है
पेटेंट की मंजूरी के तीन वर्ष बाद कोई भी इच्छुक व्यक्ति
धारा 92 - राष्ट्रीय आपातकाल
- अत्यधिक तात्कालिकता
- सार्वजनिक गैर-वाणिज्यिक उपयोग
किसी भी समय केंद्र सरकार
धारा 92A - फार्मास्युटिकल उत्पादों के निर्यात के लिए
- अपर्याप्त निर्माण क्षमता वाले देशों के लिए
किसी भी समय कोई भी इच्छुक व्यक्ति
धारा 100 - सरकारी प्रयोजनों के लिए किसी भी समय केंद्र सरकार

अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में अनिवार्य लाइसेंसिंग

अनिवार्य लाइसेंसिंग की अवधारणा विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और संधियों में भी मान्यता प्राप्त है:

TRIPS समझौता (व्यापार-संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार)

अनुच्छेद 31 अनिवार्य लाइसेंसिंग के लिए एक कानूनी आधार प्रदान करता है, जिसे "धारक की अनुमति के बिना अन्य उपयोग" के रूप में संदर्भित किया गया है। इसमें शामिल हैं:

  • अनिवार्य लाइसेंस की गुंजाइश और अवधि उस उद्देश्य तक सीमित होनी चाहिए जिसके लिए इसे प्रदान किया गया था
  • लाइसेंस मुख्य रूप से घरेलू बाजार की आपूर्ति के लिए होना चाहिए
  • पेटेंट धारक को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए
  • राष्ट्रीय आपातकाल, अत्यधिक तात्कालिकता, या सार्वजनिक गैर-वाणिज्यिक उपयोग के मामलों में स्वैच्छिक लाइसेंस के लिए पहले प्रयास की आवश्यकता नहीं है

दोहा घोषणा

2001 की दोहा घोषणा ने TRIPS समझौते और सार्वजनिक स्वास्थ्य के संबंध में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण प्रदान किया। इसने पुष्टि की कि:

  • TRIPS समझौता सदस्य देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उपाय करने से नहीं रोकता
  • प्रत्येक सदस्य को अनिवार्य लाइसेंस देने का अधिकार है और उन परिस्थितियों को निर्धारित करने की स्वतंत्रता है जिनके तहत ऐसे लाइसेंस दिए जाते हैं
  • प्रत्येक सदस्य को यह निर्धारित करने का अधिकार है कि क्या राष्ट्रीय आपातकाल या अत्यधिक तात्कालिकता की स्थिति मौजूद है

बर्न कन्वेंशन

कॉपीराइट के संदर्भ में, बर्न कन्वेंशन के अनुच्छेद 11bis(2) और अनुच्छेद 13(1) साहित्यिक और कलात्मक कार्यों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य लाइसेंसिंग का कानूनी आधार प्रदान करते हैं। वे उन शर्तों को निर्दिष्ट करते हैं जिनके तहत बर्न कन्वेंशन के सदस्य अनिवार्य लाइसेंसिंग के माध्यम से विशेष अधिकारों के प्रयोग को नियंत्रित कर सकते हैं।


अनिवार्य लाइसेंसिंग का उद्देश्य, आशय और महत्व

सार्वजनिक हित और पेटेंट अधिकारों के बीच संतुलन

अनिवार्य लाइसेंसिंग का मूलभूत उद्देश्य सार्वजनिक हित और पेटेंट धारकों के निजी अधिकारों के बीच एक संतुलन स्थापित करना है। यह एक तंत्र के रूप में कार्य करता है जो पेटेंट प्रणाली के दुरुपयोग को रोकता है और सुनिश्चित करता है कि पेटेंट किए गए उत्पाद और तकनीकें समाज के लिए सुलभ बनी रहें।

अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रमुख उद्देश्य

  • आवश्यक उत्पादों तक पहुंच सुनिश्चित करना: विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा, खाद्य सुरक्षा और अन्य मौलिक मानवीय आवश्यकताओं के क्षेत्र में
  • प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना: बाजार में एकाधिकार को कम करके और प्रतिस्पर्धी मूल्यों को प्रोत्साहित करके
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सुगम बनाना: विशेष रूप से विकासशील देशों में
  • पेटेंट के दुरुपयोग को रोकना: जहां पेटेंट धारक अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं
  • आपात स्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया: राष्ट्रीय आपातकाल या महामारी जैसी स्थितियों में महत्वपूर्ण उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करना

अनिवार्य लाइसेंसिंग का महत्व

अनिवार्य लाइसेंसिंग का महत्व विभिन्न आयामों में देखा जा सकता है:

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षण: यह जीवनरक्षक दवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करके सार्वजनिक स्वास्थ्य को संरक्षित करता है, विशेष रूप से विकासशील देशों में
  • आर्थिक विकास: यह स्थानीय उद्योगों को विकसित होने और प्रौद्योगिकी को अपनाने में सक्षम बनाता है
  • नवाचार को प्रोत्साहन: यह पेटेंट अधिकारों के संभावित दुरुपयोग को सीमित करके और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देकर नवाचार को प्रोत्साहित करता है
  • उपभोक्ता हित: यह सामान्य उपभोक्ताओं के लिए सस्ती कीमतों पर महत्वपूर्ण उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है

उपरोक्त रडार चार्ट विभिन्न देशों में अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रभाव और उपयोग के विभिन्न पहलुओं की तुलना करता है। जैसा कि चार्ट से स्पष्ट है, भारत और थाईलैंड जैसे विकासशील देश जनहित संरक्षण और औषधि तक पहुंच के मामले में अधिक स्कोर करते हैं, जबकि अमेरिका जैसे विकसित देश पेटेंट अधिकार संतुलन और नवाचार पर प्रभाव में अधिक स्कोर करते हैं।


अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रमुख मामले और उदाहरण

भारत में अनिवार्य लाइसेंसिंग के मामले

बायर बनाम नैटको फार्मा (2012)

भारत में अनिवार्य लाइसेंसिंग का सबसे प्रसिद्ध मामला नैटको फार्मा को 2012 में बायर की कैंसर-रोधी दवा नेक्सावार (सोरफेनिब) के लिए दिया गया लाइसेंस है। पेटेंट नियंत्रक ने निम्नलिखित आधार पर यह लाइसेंस दिया:

  • दवा की उच्च कीमत (₹2.8 लाख प्रति माह की खुराक) के कारण भारत में अधिकांश रोगियों के लिए यह अत्यधिक महंगी थी
  • बायर दवा की पर्याप्त मात्रा आपूर्ति नहीं कर रहा था, इसलिए भारत में जनता की उचित आवश्यकताएं पूरी नहीं हो रही थीं
  • दवा भारत में निर्मित नहीं की जा रही थी

नैटको को दिए गए अनिवार्य लाइसेंस ने यह सुनिश्चित किया कि नेक्सवार का जेनेरिक संस्करण ₹8,800 प्रति माह की खुराक (लगभग 100 यूरो) में बेचा जाए, जो बायर के मूल उत्पाद की कीमत से 97% कम है। नैटको को बायर को सभी बिक्री का 6% रॉयल्टी के रूप में भुगतान करना था।

अंतरराष्ट्रीय अनिवार्य लाइसेंसिंग के मामले

थाईलैंड में एचआईवी/एड्स दवाओं के लिए अनिवार्य लाइसेंस (2006-2007)

2006-2007 में, थाईलैंड ने मेर्क की एचआईवी दवा एफावीरेंज़ और एबॉट की कालेट्रा सहित कई दवाओं के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी किए। इन लाइसेंसों ने दवाओं की कीमतों में 90% तक की कमी की, जिससे हजारों थाई नागरिकों को जीवनरक्षक दवाएं सुलभ हुईं।

दक्षिण अफ्रीका में एचआईवी/एड्स दवाएं (2001)

2001 में, दक्षिण अफ्रीका ने एचआईवी/एड्स की दवाओं के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी करने की योजना बनाई, जिसके विरुद्ध 39 फार्मास्युटिकल कंपनियों ने मुकदमा दायर किया। अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण, कंपनियों ने अपना मुकदमा वापस ले लिया और बाद में कम कीमतों पर दवाएं उपलब्ध कराने के लिए सहमत हो गईं।

ब्राजील में एचआईवी/एड्स दवाएं (2007)

2007 में, ब्राजील ने मेर्क की एचआईवी दवा एफावीरेंज़ के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी किया। इसके परिणामस्वरूप, ब्राजील एफावीरेंज़ के जेनेरिक संस्करण का आयात करने और बाद में इसे स्थानीय रूप से उत्पादित करने में सक्षम हुआ, जिससे दवा की कीमत 72% तक कम हो गई।

कोविड-19 महामारी के दौरान इजरायल (2020)

2020 में, इजरायल ने एबीवी की दवा कालेट्रा (लोपिनावीर/रितोनावीर) के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी किया, जिसका उपयोग कोविड-19 के रोगियों के उपचार में संभावित दवा के रूप में किया जा रहा था।


अनिवार्य लाइसेंसिंग की संकल्पनात्मक समझ

अनिवार्य लाइसेंसिंग की व्यापक संकल्पनात्मक समझ विकसित करने के लिए, निम्नलिखित माइंडमैप इसके विभिन्न पहलुओं को संश्लेषित करता है:

mindmap root["अनिवार्य लाइसेंसिंग"] ["कानूनी आधार"] ["भारतीय कानून"] ["धारा 84 - मुख्य प्रावधान"] ["धारा 92 - आपातकाल"] ["धारा 92A - निर्यात"] ["धारा 100 - सरकारी उपयोग"] ["अंतरराष्ट्रीय कानून"] ["TRIPS अनुच्छेद 31"] ["दोहा घोषणा"] ["बर्न कन्वेंशन"] ["उद्देश्य और महत्व"] ["सार्वजनिक स्वास्थ्य"] ["आवश्यक दवाओं तक पहुंच"] ["प्रतिस्पर्धा प्रोत्साहन"] ["प्रौद्योगिकी हस्तांतरण"] ["पेटेंट दुरुपयोग पर रोक"] ["आवेदन प्रक्रिया"] ["पात्रता"] ["आवश्यक दस्तावेज"] ["समय सीमा"] ["रॉयल्टी निर्धारण"] ["मामले और उदाहरण"] ["नैटको बनाम बायर (भारत)"] ["थाईलैंड में एचआईवी दवाएं"] ["दक्षिण अफ्रीका का मामला"] ["ब्राजील में एफावीरेंज़"] ["चुनौतियां और सीमाएं"] ["अंतरराष्ट्रीय व्यापार तनाव"] ["कंपनियों द्वारा विरोध"] ["नवाचार पर संभावित प्रभाव"] ["लागू करने में कठिनाइयां"]

अनिवार्य लाइसेंसिंग के चित्रित उदाहरण

अनिवार्य लाइसेंसिंग की अवधारणा और इसके प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने के लिए, निम्नलिखित छवियां इसके विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं:

अनिवार्य लाइसेंसिंग की अवधारणा

अनिवार्य लाइसेंसिंग बौद्धिक संपदा अधिकारों और जनहित के बीच संतुलन स्थापित करती है।

भारत में अनिवार्य लाइसेंसिंग

भारतीय पेटेंट अधिनियम के तहत अनिवार्य लाइसेंसिंग का कानूनी ढांचा।


विशेषज्ञ विश्लेषण: अनिवार्य लाइसेंसिंग

इस वीडियो में भारत में अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रावधानों की विस्तृत व्याख्या की गई है। वीडियो पेटेंट अधिनियम के तहत विभिन्न धाराओं का विश्लेषण करता है और अनिवार्य लाइसेंसिंग प्रक्रिया को समझाता है। यह जानकारी कानूनी पेशेवरों, शोधकर्ताओं और बौद्धिक संपदा अधिकारों के छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अनिवार्य लाइसेंसिंग और स्वैच्छिक लाइसेंसिंग में क्या अंतर है?
स्वैच्छिक लाइसेंसिंग में, पेटेंट धारक अपनी मर्जी से किसी तीसरे पक्ष को अपने पेटेंट का उपयोग करने का अधिकार देता है, जबकि अनिवार्य लाइसेंसिंग में सरकार पेटेंट धारक की सहमति के बिना किसी तीसरे पक्ष को पेटेंट का उपयोग करने की अनुमति देती है। अनिवार्य लाइसेंस आमतौर पर तब दिया जाता है जब पेटेंट धारक जनहित में काम नहीं कर रहा हो या जब आवश्यक उत्पाद उचित मूल्य पर उपलब्ध न हो।
क्या अनिवार्य लाइसेंसिंग से नवाचार प्रभावित होता है?
अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रभाव पर विभिन्न मत हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नवाचार प्रभावित हो सकता है क्योंकि यह पेटेंट से मिलने वाले लाभों को कम करता है, जिससे कंपनियां अनुसंधान और विकास में निवेश करने से हतोत्साहित हो सकती हैं। दूसरी ओर, कुछ का तर्क है कि अनिवार्य लाइसेंसिंग केवल असाधारण परिस्थितियों में उपयोग की जाती है और इसका उद्देश्य पेटेंट के दुरुपयोग को रोकना है, जो वास्तव में नवाचार को प्रोत्साहित कर सकता है।
भारत में अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन कौन कर सकता है?
भारत में, पेटेंट अधिनियम की धारा 84 के अनुसार, कोई भी इच्छुक व्यक्ति पेटेंट की मंजूरी के तीन वर्ष बाद किसी भी समय पेटेंट नियंत्रक को अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकता है। आवेदन करने के लिए, आवेदक को यह प्रदर्शित करना होगा कि (i) जनता की उचित आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई हैं, (ii) पेटेंट आविष्कार जनता को उचित मूल्य पर उपलब्ध नहीं है, या (iii) पेटेंट आविष्कार का भारत के क्षेत्र में उपयोग नहीं किया जा रहा है।
अनिवार्य लाइसेंस की अवधि क्या होती है?
अनिवार्य लाइसेंस की अवधि आमतौर पर उस उद्देश्य तक सीमित होती है जिसके लिए इसे प्रदान किया गया था। भारतीय पेटेंट अधिनियम के अनुसार, पेटेंट नियंत्रक अनिवार्य लाइसेंस की अवधि निर्धारित करता है, जो पेटेंट की अवधि से अधिक नहीं हो सकती। अनिवार्य लाइसेंस की समाप्ति के बाद, यदि परिस्थितियां अभी भी वैसी ही हैं, तो लाइसेंस का नवीनीकरण किया जा सकता है।
क्या अनिवार्य लाइसेंस पर रॉयल्टी देनी होती है?
हां, अनिवार्य लाइसेंस प्राप्त करने वाले को पेटेंट धारक को रॉयल्टी का भुगतान करना होता है। रॉयल्टी का निर्धारण पेटेंट नियंत्रक द्वारा किया जाता है और यह आमतौर पर उत्पाद की बिक्री का एक प्रतिशत होता है। भारत में नैटको-बायर मामले में, नैटको को बायर को सभी बिक्री का 6% रॉयल्टी के रूप में भुगतान करना था, जो संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा अनुशंसित दिशानिर्देशों के अनुसार था।

संदर्भ

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Last updated April 8, 2025

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